भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए उर्वरक क्षेत्र को ‘रणनीतिक’ दर्जा क्यों दिया जाना चाहिए?


हाल ही में, एक संसदीय समिति ने सरकार से उर्वरक क्षेत्र को ‘रणनीतिक’ श्रेणी में रखने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि वर्तमान में इसे ‘गैर-रणनीतिक’ मानना भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन के लक्ष्यों के साथ मेल नहीं खाता, खासकर जब हम लगातार बढ़ती आयात निर्भरता और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। तो चलिए, समझते हैं कि यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण क्यों है।


क्यों है यह मुद्दा इतना खास?

1. कृषि और खाद्य सुरक्षा का अटूट रिश्ता

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र हमारी GDP में लगभग 16% का योगदान करते हैं और 46% से अधिक आबादी को आजीविका देते हैं। इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ हैं उर्वरक, जो कृषि उत्पादकता और हमारी खाद्य संप्रभुता (food sovereignty) के लिए बेहद ज़रूरी हैं।

संसदीय समिति ने पाया कि भारत उर्वरकों के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है। हम यूरिया का 25%, फॉस्फेट का 90% और पोटाश का 100% आयात करते हैं। यह निर्भरता हमें वैश्विक बाज़ारों में होने वाले उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसीलिए, घरेलू उत्पादन को मजबूत करने और सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियों (PSUs) को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है।

2. सार्वजनिक क्षेत्र की कमज़ोर हिस्सेदारी

आश्चर्य की बात यह है कि उर्वरक उत्पादन में हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का योगदान काफी कम है। यूरिया उत्पादन में उनकी हिस्सेदारी केवल 25% है, जबकि गैर-यूरिया उर्वरकों में यह और भी कम, 11% है। इसकी तुलना में, निजी क्षेत्र का दबदबा है, जिसका योगदान 57% से अधिक है।

समिति ने जोर देकर कहा कि PSUs छोटे और सीमांत किसानों के लिए कीमतों को स्थिर रखने का काम करते हैं, जो सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी के माध्यम से संभव हो पाता है। यह एक और बड़ा कारण है कि इस क्षेत्र को रणनीतिक दर्जा मिलना चाहिए।


क्या हैं चुनौतियाँ और आगे की राह?

इस क्षेत्र को रणनीतिक दर्जा देने में कुछ चुनौतियाँ भी हैं:

  • नीतिगत विरोधाभास: कृषि मंत्रालय इसे खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक मानता है, जबकि निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) इसे एक गैर-रणनीतिक व्यावसायिक क्षेत्र मानता है। इस विरोधाभास से सुधारों की गति धीमी हो रही है।
  • पुरानी तकनीक: कई सरकारी संयंत्र पुरानी तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिनकी कार्यक्षमता कम है और आधुनिकीकरण के लिए भारी निवेश की ज़रूरत है।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

इन चुनौतियों के बावजूद, भारत ने उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता लाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

  • ‘वन नेशन वन फर्टिलाइजर’ (ONOF) पहल: यह पहल उर्वरकों की ब्रांडिंग को मानकीकृत करती है, जैसे ‘भारत यूरिया’ और ‘भारत DAP’, जिससे किसानों को समान गुणवत्ता मिलती है।
  • नैनो-उर्वरक: नैनो यूरिया और नैनो DAP जैसे नए उत्पाद, जो कम मात्रा में अधिक प्रभावी होते हैं और मिट्टी के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाते हैं।
  • नीम-लेपित यूरिया (NCU): यह यूरिया की दक्षता को बढ़ाता है और इसके उपयोग को 10% तक कम करता है।
  • PM-PRANAM योजना: यह रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण योजना है।

क्या है समाधान?

भारत को अपने उर्वरक क्षेत्र को truly ‘आत्मनिर्भर’ बनाने के लिए कुछ और कदम उठाने होंगे:

  1. घरेलू उत्पादन को बढ़ावा: बंद पड़ी इकाइयों को फिर से शुरू करना और नई निवेश नीतियों को लागू करना।
  2. नवाचार और अनुसंधान: नैनो-उर्वरकों और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन के लिए R&D में निवेश करना।
  3. सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP): उत्पादन क्षमता और नवाचार को बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी को प्रोत्साहित करना।
  4. वित्तीय प्रोत्साहन: नैनो-उर्वरक के उत्पादन के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना शुरू करना।

उर्वरक क्षेत्र को ‘रणनीतिक’ दर्जा देना सिर्फ एक टैग नहीं है, बल्कि यह भारत की खाद्य सुरक्षा, कृषि अर्थव्यवस्था और किसानों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

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