खामोश हमलावर: कैसे आक्रामक प्रजातियाँ भारत के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल रही हैं

क्या आपने कभी किसी पार्क या जंगल में घूमते हुए किसी ऐसे पौधे को देखा है जो हर जगह फैला हुआ हो और वहाँ के स्थानीय पौधों का दम घोंट रहा हो? या किसी तालाब में ऐसी मछली देखी हो जो वहाँ की न लगे? ये आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (Invasive Alien Species – IAS) हो सकती हैं, और ये सिर्फ एक पारिस्थितिक परेशानी से कहीं बढ़कर हैं—ये भारत की जैव विविधता, अर्थव्यवस्था और यहाँ तक कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी एक खामोश, महंगी चुनौती हैं।

एक हालिया अध्ययन ने एक चौंकाने वाली सच्चाई का खुलासा किया है: इन आक्रामक प्रजातियों की वैश्विक आर्थिक लागत 2.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुकी है, लेकिन वास्तविक आंकड़ा शायद इससे कहीं ज्यादा है। भारत के लिए, अध्ययन बताता है कि हम इस लागत को बहुत कम आंक रहे हैं, शायद अरबों गुना कम, जो दर्शाता है कि हमारे प्रबंधन प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। तो, ये “हमलावर” आखिर हैं क्या, और ये इतने खतरनाक क्यों हैं?

ये “हमलावर” क्या हैं और ये समस्या क्यों हैं?

आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ ऐसे जीव हैं—चाहे वे पौधे हों, जानवर हों, या रोगाणु हों—जिन्हें उनके प्राकृतिक आवास के बाहर किसी नए वातावरण में लाया जाता है। एक बार वहाँ पहुँचने पर, वे खुद को स्थापित कर लेते हैं, तेज़ी से प्रजनन करते हैं, और संसाधनों के लिए स्थानीय प्रजातियों से प्रतिस्पर्धा करते हैं। वे बेहतरीन सर्वाइवर होते हैं, जहाँ दूसरे विफल होते हैं, वहाँ वे फलते-फूलते हैं, और इस प्रक्रिया में पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद कर देते हैं।

भारत में, हमने इसे खुद जलकुंभी (Water Hyacinth) जैसी प्रजातियों के साथ देखा है, जिसे मूल रूप से इसके सुंदर फूलों के लिए लाया गया था लेकिन अब यह “बंगाल का आतंक” बन चुकी है, जो जल निकायों को अवरुद्ध कर रही है और जलीय जीवन को नष्ट कर रही है। अन्य कुख्यात हमलावरों में लैंटाना की झाड़ियाँ और अफ्रीकी कैटफ़िश शामिल हैं।

इनका बढ़ना कोई संयोग नहीं है। इसके पीछे कई कारण हैं:

  • वैश्वीकरण (Globalization): बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और यात्रा से प्रजातियों का कार्गो, जहाजों के गिट्टी के पानी या व्यक्तिगत सामान के माध्यम से अनजाने में प्रसार होता है।
  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change): बदलती जलवायु इन हमलावरों के लिए नए, अनुकूल आवास बनाती है, जबकि साथ ही स्थानीय प्रजातियों को कमजोर करती है, जिससे वे अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
  • आवास में गड़बड़ी (Habitat Disturbance): वनों की कटाई और शहरीकरण जैसी मानवीय गतिविधियाँ खराब हुई भूमि का निर्माण करती हैं जो पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस (गाजर घास) जैसी आक्रामक प्रजातियों के लिए एकदम सही प्रजनन स्थल है।

तीन गुना खतरा: पारिस्थितिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव

इन हमलों के परिणाम दूरगामी हैं, जो तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर प्रभाव डालते हैं:

  1. पारिस्थितिक प्रभाव: आक्रामक प्रजातियाँ विश्व स्तर पर जैव विविधता के नुकसान के शीर्ष पांच प्रत्यक्ष चालकों में से एक हैं। वे प्रतिस्पर्धा, शिकार, या बीमारी के माध्यम से स्थानीय प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर धकेल सकती हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य बाधित होते हैं और पारिस्थितिक असंतुलन पैदा होता है। गुआम द्वीप पर ब्राउन ट्री स्नेक के बारे में सोचें, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गलती से लाया गया था और इसने कई स्थानीय वन पक्षी प्रजातियों के स्थानीय विलुप्ति का कारण बना।
  2. आर्थिक प्रभाव: वित्तीय बोझ बहुत बड़ा है। ये हमलावर कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन जैसे प्रमुख क्षेत्रों को पंगु बना देते हैं। यूरोप में, उच्च कृषि मूल्यों के कारण लागत चौंकाने वाली है। भारत में, बाधित हुई विक्टोरिया झील में मछली की आबादी में बड़ी गिरावट आई है, जिससे स्थानीय आजीविका प्रभावित हुई है।
  3. स्वास्थ्य प्रभाव: यह सिर्फ प्रकृति के बारे में नहीं है; यह हमारे बारे में भी है। एडीज एजिप्टी जैसे कुछ मच्छर मलेरिया और जीका जैसी बीमारियों को फैला सकते हैं। अन्य, जैसे पार्थेनियम, गंभीर श्वसन संबंधी विकार और त्वचा एलर्जी का कारण बन सकते हैं।

समन्वित कार्रवाई का आह्वान: आगे की राह

इस गंभीर तस्वीर के बावजूद, भारत चुप नहीं बैठा है। हमारे पास इस मुद्दे से निपटने के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना और पादप संगरोध आदेश, 2003 जैसी पहलें हैं। विश्व स्तर पर, कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क जैसे ढाँचे अपने प्रभाव को कम करने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करते हैं।

फिर भी, इस खतरे से सही मायने में मुकाबला करने के लिए, हमें कुछ मुख्य चुनौतियों का समाधान करना होगा:

  • डेटा और रिपोर्टिंग में कमी: हमें इन प्रजातियों की लागत और प्रसार को सही ढंग से ट्रैक और रिपोर्ट करने के लिए एक केंद्रीकृत, मजबूत डेटाबेस की आवश्यकता है।
  • संसाधन की कमी: निगरानी और उन्मूलन के लिए वित्तीय और मानव संसाधन सीमित हैं और इसमें महत्वपूर्ण वृद्धि की आवश्यकता है।
  • नीतिगत खामियां: हमें जैव विविधता अधिनियम, 2002 और पादप संगरोध नियमों जैसे विभिन्न कानूनों और मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है, ताकि एक एकीकृत और प्रभावी रणनीति बनाई जा सके।

समाधान तीन I में निहित है: प्रभावी प्रवर्तन के लिए मजबूत संस्थान (Institutions), हमारे व्यापक जलवायु और जैव विविधता रणनीतियों में आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन का एकीकरण (Integration), और समुदायों की सक्रिय भागीदारी (Involvement) केरल की कदार जनजाति जैसी पहलें, जो आक्रामक प्रजातियों को हटाकर सक्रिय रूप से अपने जंगलों को बहाल कर रही हैं, हमें दिखाती हैं कि समुदाय-नेतृत्व वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण है।

साथ मिलकर काम करके, हम भारत की समृद्ध जैव विविधता की रक्षा कर सकते हैं, अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित कर सकते हैं, और सभी के लिए एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।

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