गणेश चतुर्थी: जब हाथी के सिर वाले देवता पहली बार धरती पर आए और दिलों को जीत लिया

र साल, जब भाद्रपद मास आता है, तो भारत के हर कोने में एक अद्भुत उत्साह, रंग और भक्ति का माहौल छा जाता है। ढोल-नगाड़ों की गूँज, मोदकों की सुगंध और “गणपति बाप्पा मोरया!” के जयकारे… यह सब एक ही त्योहार का संकेत है: गणेश चतुर्थी!

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम इस प्यारे, बुद्धिमान और विघ्नहर्ता देवता का इतना भव्य स्वागत क्यों करते हैं? इसकी जड़ें एक प्राचीन कहानी में छिपी हैं, एक ऐसी कहानी जो हमें बताती है कि कैसे एक अनोखे बालक का जन्म हुआ, उसने चुनौती का सामना किया, और फिर देवताओं के भी प्रिय बन गए।

एक बालक का अनोखा जन्म और माँ का असीम प्रेम

कहते हैं, कैलाश पर्वत पर देवी पार्वती को अक्सर अकेलापन महसूस होता था जब भगवान शिव ध्यान में लीन होते या बाहर भ्रमण पर जाते। एक दिन, उनके मन में एक विचार आया—क्यों न उनके पास अपना एक पुत्र हो, जो उनकी अनुपस्थिति में उनकी रक्षा करे और उनका साथ निभाए।

उन्होंने अपने शरीर से उतारी गई मैल और चंदन के लेप से एक सुंदर बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूँक दिए। यही थे गणेश

पार्वती माँ ने उन्हें अपना द्वारपाल नियुक्त किया और सख्त निर्देश दिए कि उनकी अनुमति के बिना कोई भी भीतर प्रवेश न करे। बालक गणेश ने अपनी माँ की आज्ञा को शिरोधार्य किया।


पिता से हुई अनजाने में भिड़ंत और एक नया जीवन

कुछ समय बाद, भगवान शिव तपस्या से लौटे और भीतर जाना चाहा। लेकिन द्वार पर खड़े इस बालक ने, जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था, उन्हें रोक दिया। शिव ने बहुत समझाया, लेकिन गणेश अपनी माँ की आज्ञा पर अटल रहे।

बात बढ़ती गई और क्रोधित शिव ने अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।

जब देवी पार्वती को यह पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित और दुखी हुईं। उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। भगवान शिव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने पार्वती को शांत करने के लिए प्रतिज्ञा की कि वे बालक को फिर से जीवित करेंगे। उन्होंने देवताओं को आदेश दिया कि जो भी पहला जीव उत्तर दिशा की ओर सिर करके मिले, उसका सिर ले आएं।

देवताओं को एक हाथी का बच्चा मिला, जिसका सिर लाकर गणेश के धड़ पर लगा दिया गया। भगवान शिव ने उसमें फिर से प्राण फूँके। इस तरह, गणेश ने गजमुख के साथ दूसरा जीवन पाया।


विघ्नहर्ता का वरदान और प्रथम पूज्य का स्थान

गजमुख गणेश को देखकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे सभी देवताओं में प्रथम पूज्य होंगे। कोई भी शुभ कार्य या पूजा उनके बिना सफल नहीं होगी। उन्होंने गणेश को ‘विघ्नहर्ता’ का नाम दिया, जिसका अर्थ है सभी बाधाओं को दूर करने वाला।

ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं ने भी गणेश को उनकी बुद्धि, शक्ति और निस्वार्थ भक्ति के लिए आशीर्वाद दिया। तभी से, गणेश सभी बाधाओं को दूर करने वाले, ज्ञान और समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं।


आज हम क्यों मनाते हैं गणेश चतुर्थी?

यही कारण है कि हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हम गणेश चतुर्थी मनाते हैं। यह सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि गणेश के जन्म, उनके अद्वितीय स्वरूप और विघ्नहर्ता के रूप में उनकी स्थापना का एक भव्य स्मरण है।

  • पुनर्जन्म का उत्सव: यह दिन हमें बताता है कि कैसे चुनौतियों के बाद भी एक नया और बेहतर जीवन संभव है।
  • प्रथम पूज्य: गणेश की पूजा करके हम सभी बाधाओं को दूर करने और किसी भी नए कार्य को सफलतापूर्वक शुरू करने के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं।
  • पार्वती का प्रेम: यह त्योहार माँ पार्वती के अपने पुत्र के प्रति असीम प्रेम और मातृत्व शक्ति का भी प्रतीक है।
  • ज्ञान और बुद्धि: गणेश को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है, इसलिए विद्यार्थी और ज्ञानी जन विशेष रूप से उनकी आराधना करते हैं।

गणेश चतुर्थी पर हम मिट्टी की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित करते हैं, मोदक और तरह-तरह के पकवान बनाते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं, और ढोल-ताशे बजाकर उनका स्वागत करते हैं। यह दस दिनों का उत्सव होता है, जिसके बाद अनंत चतुर्दशी पर गणेश की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है, इस विश्वास के साथ कि वे अपने साथ हमारी सारी परेशानियां ले जाएंगे और अगले साल फिर वापस आएंगे।

तो, अगली बार जब आप “गणपति बाप्पा मोरया!” का नारा सुनें, तो इस कहानी को याद करें—एक बालक जिसने अपनी माँ के प्रेम के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, जिसने अनजाने में पिता से युद्ध किया, और फिर अपने नए स्वरूप के साथ सभी बाधाओं को दूर करने वाले देवता बन गए।

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