ब्रह्मचर्य पालन-जमीन पर नींद, भिक्षा न मिले तो भूखे सोना:जींस-टीशर्ट पहनने वाला कैसे बना नागा साधु, संन्यासी ने बताई पूरी कहानी

मैं सामान्य लड़कों की तरह ही था। जींस-टीशर्ट पहनता था। स्कूल जाता था। संन्यास लेने के बारे में तो कभी सोचा भी नहीं था, लेकिन परिवार में कुछ ऐसा हुआ कि अपने ही लोगों से मोह भंग हो गया। वो बेगाने लगने लगे। लगा कि समाज ठीक नहीं है। तब घर से निकलकर संन्यासी बन गया। 12 साल तपस्या की और नागा बन गया।

ये शब्द महाकुंभ मेले में गुजरात से आए नागा संन्यासी मुनिंदर भारतीय के हैं। बर्फानी नागा बाबा मुनिंदर भारतीय से लंबी बातचीत की। नागा संन्यासी से जुड़े हर वो सवाल पूछे, जो आम आदमी के मन में चलते हैं।

मुनिंदर भारतीय नागा बाबा से आधे घंटे तक बात करने के बाद हमें लगा कि यही सही समय है जब बाबा से नागा संन्यासी बनाने की पूरी प्रक्रिया जान सकते हैं | सनातन का सब कुछ लोगों के सामने नहीं आना चाहिए, क्योंकि इसका दुरुपयोग किया जाता है। लेकिन फिर थोड़ी देर बाद बताया कि जिनको भी नागा साधु बनना होता है, वो अपने गुरु के सानिध्य में नागा बनाने के लिए अपने अखाड़े में पर्ची कटवाते हैं। या सामान्य भाषा में कहें तो अपना रजिस्ट्रेशन करवाते हैं।

48 घंटे पहले से ही शुरू हो जाती है तपस्या

नागा बनने की प्रक्रिया शाही स्नान के दिन के 48 घंटे पहले से शुरू हो जाती है। इस बार तीन शाही स्नान हैं, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी। एक बीत चुका है, बाकी स्नान में भी नागा संस्कार होगा।

मुनिंदर भारतीय नागा बाबा ने बताया कि नागा संन्यासी बनने के 48 घंटे पहले साधु अपने गुरु के साथ कुंभ में जाते हैं। नागा बनने वाले साधुओं को गुरु द्वारा दी गई लंगोटी पहनाकर धर्म ध्वजा के नीचे बैठाया जाता है।

इस दौरान जप किया जाता है। ये जप तकरीबन 24 घंटे चलता है। साधु को व्रत रखना होता है। उसे सिर्फ जल ही दिया जाता है। अपने जीवन में किए गए कर्म-कुकर्म दोनों का लेखा-जोखा देना पड़ता है। इस जीवन में जो भी पाप हुए हैं, उसका गुरु जप के माध्यम से प्रायश्चित कराते हैं।

पिंड दान से पहले पीछे हटने का आखिरी मौका होता है

अगले दिन सुबह 4 बजे गंगा स्नान के लिए ले जाया जाता है। वहां पर मंत्र का उच्चारण किया जाता है। गुरु ने जो लंगोटी दी थी, उसे शरीर से उतारा जाता है। दूसरा लंगोट दिया जाता है और हमें दीक्षित किया जाता है। फिर से एक बार धर्म ध्वजा के नीचे लाया जाता है, जहां पर हवन प्रक्रिया चलती है। इसे विजय हवन कहा जाता है।

हवन और मंत्र उच्चारण लगभग 20 घंटे तक चलता है। उस दौरान मंत्र दिया जाता है जो सिर्फ संन्यासियों के लिए ही होता है। इसके बाद सुबह फिर से गंगा घाट पर ले जाया जाता है। घाट पर मुंडन होता है जहां चोटी गुरु रख लेते हैं। ये आखिरी मौका होता है जब साधु इस पूरे अनुष्ठान से पीछे हट सकते हैं। अगर नहीं हटते तब उन्हें पिंडदान की प्रक्रिया करनी होती है। मुनिंदर भारतीय कहते हैं पहले हम परिवार की बेटियों को छोड़ कर सातों पीढ़ी का पिंड दान करते हैं। 16 पिंड बनाते हैं। फिर 17वां खुद का पिंड दान करना होता है।

उसके बाद फिर से हमें अखाड़े पर लाया जाता है। जहां, अखाड़े के पुरोहित मंत्र उच्चारण करते हैं। उसी दौरान पूरी, गिरी, सरस्वती और भारतीय अखाड़ों से जनेऊ, रुद्राक्ष, दंड कमंडल और गेरुआ वस्त्र दिया जाता है।

शाही स्नान के बाद तीन झटके में इंद्रियों को तोड़ दिया जाता है …

अब नागा बनाने वाले साधुओं को तीसरे दिन फिर से गंगा घाट पर ले जाया जाता है। 108 बार डुबकी लगवाई जाती है। ये डुबकी शाही स्नान के दिन लगाई जाती है। उसके बाद धर्मध्वजा के नीचे ओमकार मंत्र जाप के लिए पंजों पर खड़ा होना होता है। उस दौरान हाथ जोड़कर धर्म ध्वजा की तरफ देखना होता है। फिर दिगंबर गुरु अपने अंगूठे पर रुद्राक्ष लेकर नागा बनने वाले के प्राइवेट पार्ट को तीन झटके देकर खींच देते हैं। इसके साथ ही साधु, नागा बन जाते हैं।

हमने मुनिंदर भारतीय से पूछा कि इस प्रक्रिया के दौरान दर्द नहीं होता क्या? वो बताते हैं कि जननांग पर हल्की चोट लग जाती है तो हम बैठ जाते हैं। सोचो इस दौरान कितना दर्द होता होगा। उन्होंने बताया कि ऐसा लगता है कि जान निकल जाएगी। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिनकी जान चली जाती है।

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